MERE SAATH AKSAR AISA HOTA HAI BY BHANU PRAKASH RAGHUVANSHI

 

"मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है"

द्वारा : भानु प्रकाश रघुवंशी 

विधा : काव्य 

वेरा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 

प्रथम संस्करण : 2025

मूल्य :195.00

समीक्षा क्रमांक : 182

 परिवार , प्रकृति, किसान पर आम जन की मनोभावनाओं को अत्यंत खूबसूरती से  व्यक्त करते हैं भानुप्रकाश रघुवंशी अपने इस संग्रह में चयनित 60 से भी अधिक कविताओं के द्वारा । 

संग्रह की कविताओं की विशेषता, उनकी सरल किंतु अर्थपूर्ण भाषा कही जा सकती है, जो तब  भी अत्यंत संयमित एवं मर्यादित बनी रहती है जब वे व्यवस्था एवं कुछेक कविताओं में राजनैतिक स्थितियों पर अपना आक्रोश, तथा  इस अव्यवस्था के प्रति अपनी भावनाओं को विचारों के  ज्वलंत प्रवाह के संग व्यक्त करते हैं।

संग्रह की प्रारंभिक कुछ कवितायेँ  उन्होंने मां को समर्पित की हैं  जहां माँ के प्रति उनकी भावनाएं मां से संबंधित छोटी छोटी बात और माँ के बिछुड़ने का दर्द कविताओं का मूल भाव है एवं उनके माध्यम से से मां की महानता एवं समर्पण खुलकर सामने आता है ।  पंक्ति विशेष की बात कर पाना संभव नहीं है चूंकि उनकी प्रत्येक कविता की अमूमन हर पंक्ति एवं उनके लिए चयनित शब्द बहुत गहरी बात कह जाते हैं । ऐसा सिर्फ उन कविताओं में नहीं जो उनके द्वारा मां की याद में मां के लिए कही गई हैं अपितु संग्रह में सँजोई गई उनकी समस्त कृतियां विचारों एवं भावनाओं का ,कवि हृदय में उठते हुए भावनाओं के एक  विराट आंदोलन की झलक मात्र है ।   

भावनाओं का शांत सहज सरल प्रवाह अमूमन उनकी प्रत्येक कविता में मिल जाता है ,फिर भावनाएं मां एवं समीपस्थ रिश्तों के प्रति हों या फिर पास पड़ोस एवं अन्य संपर्कों के प्रति , जिन्हें वे अत्यंत ईमानदारी से अभिव्यक्त करते हैं ।

प्रारंभिक कुछ कविताओं में उन्होंने बहुत शिद्दत्  से मां को याद  किया है किंतु शायद इन  पंक्तियों  को कविता कहना गलत ही होगा यह तो दरअसल उनके आंसू हैं जो शब्द रूप लेकर कागजों पर उभर आए हैं मां के जाने का दर्द मां से जुड़ी छोटी छोटी बातें कैसे शब्द रूप लेती गईं इन पंक्तियों को देख कर एक आभास मिलता है जब वे कविता "बोरसी" में कहते हैं कि 

मैं जब भी बरसी में आग सुलगाता हूं 

इस से उठते धुएं में मुझे

माँ की देह की गंध आती है 

और 

 एक दिन मां और मिट्टी एक रूप हो गई 

वहीं समाज में बुजुर्गों की दुर्दशा भी उनकी पैनी नजर से नहीं छुपी और बहुत स्पष्टता से उभर कर आती है उनकी कविता "जरूरी सवाल" में .

जब वे एक बुजुर्ग की दुर्दशा बयां करते हैं तब दर्द कुछ इस तरह झलकता है - 

या मिलेगा सीढ़ियां ढकने वाली चद्दरों के नीचे 

ओढ़े हुए रामनामी

जो भी पुण्य किए हों उनके बदले 

ईश्वर से मांगता अपने लिए मौत की दुआ 

कविता “धरमा” सामंत वादि व्यवस्था और किसानों की कर्ज तले दबी ज़िंदगियों पर तीखा प्रहार  करती है,  वहीं परिस्थितियों से पीड़ित भावनात्मक हृदय की व्यथा व्यक्त करती है “विडंबना”और   व्यवस्था पर कुछ छुपे हुए शब्दों द्वारा बहुत कुछ कह जाती है “वो जानता था यह बात”, नारी विमर्श पर केंद्रित कविता “व्यक्तिगत कुछ भी नहीं होता”और “दु:ख अनकहा” द्वारा नारी होने की व्यथा बतलाती है वहीं अमीरी गरीबी के बीच की खाई को बेहद प्रभावपूर्ण तरीके से व्यक्त कर जाती है “टूटी ज़िप और पिन का  रिश्ता”।

कविता "बेटियां" हो या फिर  "पहली संतान" या फिर "रिश्तों की उधेड़ बुन"  दिल को छू जाती है साथ ही बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है । ये पंक्तियां देखें कि

बेटे हमेशा बेटे नहीं रहते 

वे पड़ोसी बनकर भी रहने लगते हैं 

पिता के घर में 

या चले जाते हैं दूसरे शहर दूसरे देश 

और अंत में 

बूढ़े मां बाप  एक दूसरे को दिलासा देते हुए 

एक बेटी भी न होने के लिए 

रोते हैं अपने दुर्भाग्य पर ।

अधिकांश कविताएं भावुक कर जाती हैं एवं भाव का पता तब चलता है जब आप पढ़ते पढ़ते आंखों की कोर कुछ भीगी और गला कुछ फंसता हुआ महसूस करते हैं । "आओ प्रिय", "पता नहीं" एवं "तुम्हारी याद" जैसी बहुत सी कविताएं प्रिय से मिलन का आनंद और बिछोह  की पीड़ा  दर्शा रही हैं वहीं अत्यंत शालीनता से गहरी बात कह जाते हैं अपनी रचना "और मुझे... " में    तो परिवेश से जुड़ते हुए उन्होंने सृजित करी “बेढंगा नाच” “भुजरियां” और “जहां मैं रहता हूं” जैसी कविताएं जिनमें आप जा पहुंचते है उनके साथ उनके गांव और एकाकार हो जाते हैं उस दृश्य में ।

वहीं थोड़ा जुदा सा भाव लिए और एक खरा खरा सच बयान करती उनकी कविता है "मैं कवि नहीं हूं " जहां वे तथाकथित कवियों को आईना दिखला रहे हैं जो वास्तविकता से कोसों दूर रहते हुए भी उसमें गर्भित होने का भ्रम पाले रहते हैं।

कविता "किसान" के माध्यम से वे  अवश्य ही किसानों की वर्तमान हालत पर आपका ध्यानाकर्षित करने में सफल हुए हैं जो कहीं  हल्का तंज भी है व्यवस्था पर । 

बात करें शीर्षक कविता "मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है" तो इसमें किसान का दर्द बहुत खुल कर सामने आता है । वे किसान के साथ बीते हर उस पल के साक्षी ही क्यूं भुक्तभोगी है जो आम जन शायद कभी नहीं समझ पाएगा। जहां हर उस बात को उन्होंने यह कहते हुए बेहद सरलता एवं सादगी से प्रस्तुत कर दिया है कि  ऐसा मेरे साथ तो अक्सर होता है । 

निश्चय ही कवि के भावों को अपने शब्द रूप में व्यक्त कर पाना उतना आसान नहीं होता तथापि  समीक्षा की दृष्टि से चंद कविताओं पर  बात करी है एवं उनकी कविता के भावों को जानने का प्रयास किया है किंतु यूं अनुभव कर रहा हूं कि संभवतः उनके भाव अधिक गहरे हैं  एवं उनके भावों को आपके समक्ष उस रूप में नहीं रख पा रहा हूं जो वे कहना चाहते हैं एवं शब्द शायद कम हैं अतः बस इतना ही कहना चाहूँगा की गंभीरता से गुजर जाइए इन कविताओं से , महसूस करिए उनका दर्द और निश्चय ही आप भानु जी के इस कृतित्व को सराहे बिना नहीं रह सकेंगे । 

अतुल्य

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