Jeevan Ka Rekha Ganit By Vandana Bajpeyi
जीवन का रेखा
गणित
द्वारा : वंदना बाजपेयी
समीक्षा भाग 1
यूँ तो ख्यातिलब्ध साहित्यकार वंदना वाजपेयी जी
का साझा कविता संग्रह पूर्व में प्रकाशित हुआ है किन्तु “जीवन का रेखा गणित” उनका
पहला, एकल, प्रकाशित कविता संग्रह है जिसमें
भाव पक्ष प्रबल है। हर भाव की कविताएं संजोयी गयीं है
किंतु , अधिकतर कविताओं में कवियत्री की भावपूर्ण नज़र एवं
भावना प्रधान दिल से समाज एवं आम जिंदगी का प्रतिविम्ब हमें देखने को मिलता है।। कवितायेँ जहाँ एक और नारी केंद्रित हैं तो वहीं
प्रेम व अन्य पारस्परिक रिश्तों पर भी गूढ़ एवं सुन्दर भावों को शब्दों में उकेरा
गया है।
उनकी शीर्षक कविता से ऐसा प्रतीत होता है मानो कविताएं दुनिया की आड़ी तिरछी रेखाओं के बीच जीवन की सरल राहें तलाशती हैं, किन्तु यथार्थ में तो उतार चढ़ाव विहीन जीवन की कल्पना भी असंभव सी प्रतीत होती है संभवतः ये उतार चढ़ाव भी जीवन को बेहतर रूप से जानने समझने हेतु श्रेष्ठ भूमिका अदा करते हैं। संग्रह की शीर्षक कविता में वंदना जी लिखती हैं -
रेखाएं कभी झूठ नहीं बोलतीं
झूठ बोलते हैं वृत्त
आड़ी तिरछी छोटी बड़ी
जैसी भी हों
रेखाएं स्वीकारती हैं
अपने निज रूप को
पूरी सहजता से।
और वृत्त
बनाते हैं झूठ का एक घेरा
अपने चारों ओर
कि बमुश्किल
साधा है संतुलन।
पहली ही कविता “मुझे चाहिए” में सदियों से दबी
कुचली नारी के मन की आवाज़ उठाती है, जो दिल में मानो एक आग दबाए सदियों से जी रही
है और अब वह अपने सवालों का ज़बाब मांगती है। वहीं कविता “भूकंप” का भी कुछ कुछ ऐसा ही निहितार्थ
है जिसमें नारी की ता-उम्र की विवषताएँ और भीतर ही भीतर वह बहुत कुछ अनकहा समेटे
हुए है, वे कहती हैं की :
कभी तो विचलित होता होगा मन
चाहती होगी क्षण भर विश्राम
कुछ हिस्सेदारी सूरज को भी
किरणें देने के अतिरिक्त
नियमों परंपरा से जरा सी मुक्ति
बांटना चाहती होगी जरा सा दर्द
जरा सी घुटन
तो “कूड़े की संस्कृति” में जहां कूड़े के ढेर पर
फेंक दी गयी एक नवजात को लेकर बेहद मार्मिकता से भाव उकेरे है वहीं एक तुलना करते
हुए कूड़े को हर दृष्टि से बार बार मानव से श्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि वह तो सभी
कुछ आत्मसात करता है, स्वयं में सब कुछ शामिल कर लेता है किसी को भी अलग नही करता,
कूड़े के पास मात्र एवं मात्र संग्रह है विग्रह नहीं , क्या कूड़े की संस्कृति हमारी
संस्कृति से बेहतर नहीं है, क्या इंसान
कूड़े से कुछ सीखेगा। कविता को 7
खंडों में रचा गया है एवं प्रत्येक खंड बहुत विस्तार से भावनाओं को
दर्शाता है और बहुत कुछ सोचने को विवश कर जाता है। इस
कविता में भावनाएं बेहद ख़ूबसूरती से गूंथी गयी जो कभी भाव विह्वल करती हैं तो कभी मन कविता में ऐसा खो
जाता है कि कुछ समय के लिए शून्य में विचरण करने लगता है। कहीं तीक्ष्ण व्यंग्य है कहीं अफसोस तो कहीं
गंभीर चिंता और समाज के गिरते मापदंडों व संस्कारों के प्रति रोष।
पुस्तक की इस बेहद खास कविता से चंद पंक्तियां उल्लिखित करना अनिवार्य
प्रतीत होता है,
कविता का प्रारंभ ही कितना ह्रदय विदारक है , गौर करें वे भाव
जहाँ कहतीं हैं कि :
चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद
बड़े भाग मानस तन पावा पर
प्रश्न चिन्ह लगाते हुए
खोली थी उसने आँख
अस्पताल के ठीक पीछे बने
कूड़ा घर में
--
अपशिष्ट पदार्थ
जो भींच कर ह्रदय से लगा लेना चाहते थे उसे
छलक आई थी ममता
जैसे वह हो उसकी ही संतान
यही कूड़े की संस्कृति है ( कटाक्ष पर गौर करें)
अगले खंड में, जहाँ कूड़े के ढेर पर पड़ी मासूम बच्ची , जो समाज व मीडिया के लिए बस एक खबर है और है कुछ अवसर
वादियों हेतु स्वार्थ साधने का जरिया , उन सब पर यह तीखा तंज़ देखें की:
कहाँ जानती है
माँ के दूध के लिए बिलबिलाती
वो मासूम सी बच्ची
कूड़े में कूड़े की तरह पड़ी
कि वो पाल रही है “कितनों के पेट”
यही कूड़े की संस्कृति है
--
जानती थी शायद जन्मदात्री माँ “इंसानी फितरत को”
इसी लिए तो फेंक गयी थी कूड़े में
कि लोग चीखेंगे चिल्लायेंगे
कोई पालेगा नहीं उसे
पर कूड़ा पाल ही लेता
है कूड़े को
यही कूड़े की संस्कृति है
कूड़ा कभी नहीं फेंकता किसी को
समां ही लेता है अपने अन्दर
हर पाप का पुण्य
वहीं ऐसी बालिकाओं का
क्या भविष्य होता है, इस पर अगले खंड में लिखा है की
उस कूड़े घर से बाहर खरीद फरोख्त अलग अलग ठिकानों पर है क्यूंकि
बहुत हैं इस कूड़े के खरीददार और जहाँ कूड़े की भी लगती हैं बोलियाँ , कुछ ज्यामितीय
आकारों के आधार पर और शर्मनाक पहलू जब वह बेच दी गयी किसी कोटे पर तब कहती हैं की
अब हो गयी है उसकी उन्नति
कूड़े से बन गयी थी कूड़ा घर
जो निगलती थी रोज़ अपशिष्ट पदार्थ
जलती थी हर रात
अपनी चिता में
अंत में कहती हैं कि
कब समझेंगे यह सफेदपोश
की उनका क्षणिक उन्माद
जन्म देता रहा है कूड़े
को
इसके नीचे दबकर मर जाते हैं मानवीय अधिकार
आने लगती है सड़ांध
मरे हुए जिस्म की जिंदा रूहों से
यही कूड़े की संस्कृति है।
प्रेम के विविध रूपों यथा , प्रेम है कही पितृ गृह से तो कहीं
माँ से या फिर पिता से अथवा बचपन के दिनों को वापस जी लेने को साकार करती हुई कविताएं है कहीं
प्रकृति प्रेम की चर्चा है।”मुझे घर जाना है”, पतंगें ,”थोड़े से पत्थर” व “अभिनय” भी कुछ मिश्रित भाव लिए हुए सुन्दर रचनाएँ है जो
दिल से लिखी गयी हैं जहाँ दर्द झलकता है।
वहीं माँ से प्रतीक रूप में संवाद करती सारे छल
कपट व् छद्म से दूर कहीं बचपन पुनः पा
लेने की अभिलाषा दिखलाती “माँ का झूठ” है तो माँ के मन के विभिन्न भावों को
दर्शाती कविता “अम्मा फिर से डाटो न” और “बेचैनी” है तो “गौरैया और माँ” में
प्रेम, वात्सल्य के संग पर्यावरण संरक्षण
को भी खूबसूरत तरीके से शब्दों में बाँधा गया है।
विकास में बढ़ते कंक्रीट के जंगल के लिए भेंट
चढ़ते वृक्ष और नष्ट होता प्राकृतिक संतुलन दिखलाने का खूबसूरत प्रयास किया है कविता “विकास और विनाश” में। ऐसे ही एक वृक्ष का दर्द उसकी शाखें पत्ते व
जड़ों का दर्द बेहद अंदर तक महसूस किया है मानो उस दर्द
को जिया है उन्होनें। और अंत में चेतावनी
ही समझ लें कि
प्रकृति की अनदेखी करता
विकास का यह खेल
चढ़ जाएगा विनाश की भेंट ।
"बज चुका है पांचजन्य" में पार्थ के विषाद
को दर्शाते हुए सन्देश कविता के माध्यम से यूँ गढ़ा है मानो हम सभी अर्जुन हों, यूं
तो कविता में अर्जुन को संबोधित किया है किन्तु मूल भावना आज के परिप्रेक्ष्य में
उस सन्देश को स्वयं को अर्जुन मानते हुए समझने की है। वे कहती हैं की अब वह समय आ
गया है जब हमें स्वयं को आत्म निर्भर बनाना ही होगा। हमारा हाथ थामने अब कोई कृष्ण
प्रगट नहीं होंगे देखिए कविता की ये पंक्तियां की :
कब का बज चुका है पांजन्य
अब तो उठो अर्जुन
अब पल-पल बदलते इस धर्मयुद्ध में
तुम्हें ही सीखना है
सही और गलत के मध्य निर्णय लेना
कांपते पैरों और छूटते गांडीव के साथ
सत्य के पक्ष मे खड़े होने से पहले
सीखना है
स्वयं से स्वयं के लिए खड़ा होना।
सीमित शब्दों में अत्यंत गूढार्थ समेटे हुए
कविता है ।
“कैकेयी का पश्चाताप”, में, रामायण के
परिप्रेक्ष्य में भरत के त्याग और कैकेयी के पश्चाताप को अपने नज़रिये से देखते हुए
लिखती हैं कि:
कैकेयी का पश्चाताप नहीं था स्व-वांक्षित
न खुद से किया गया अनुबंध
ये था सविनय आरोपित
और आगे भारत के लिए कहती हैं कि
भले ही राम के आलोक में
भरत कभी नहीं रहे आदर्श पुत्र
पर स्वार्थ और संबंधों से परे जाकर
उन्होंने की है स्थापना
कि गलती या गुनाह जो बदल देता है
एक युग का जीवन
महज़ शब्दों से नहीं भरे जा सकते
वो घाव उसे गुजरना ही होगा
पश्चाताप की आंच से
तपकर निखर आने तक
तो अगली कविता “गुलाब हो जाना” पढ़ते हुए पंडित माखन लाल चतुर्वेदी जी द्वारा लिखित
प्रसिद्ध कविता “पुष्प की अभिलाषा” का स्मरण सहज ही हो आता है जिसके द्वारा जीवन
जीने की कला का संदेश दिया गया है , जिसमें उन्हें नज़र आता है कि
“जो सिखाता है जीवन जीने की कला
कांटों से जीवन घिर जाना आम बात है
पर गुलाब हो जाना कोई साधारण बात
नहीं” ।
वहीं कविता किसी निष्काम कर्म योगी सा जीवन जीने हेतु उस से
प्रेरणा प्राप्त करने का सन्देश देती हुयी प्रतीत होती है व कवियत्री कविता में गुलाब
को मानवता और प्रेम से जोड़कर देखती हैं
आध्यात्मिकता की ओर झुकाव दिखलाते हुए उनकी रचना
है “प्रतिबिंब” जिसमें उन्होंने इस बात पर ध्यान आकर्षित किया है की हम जो अंदर से
हैं वही हमें बाहर नजर आता है बड़ी खूबसूरत पंक्तियां है वे लिखती हैं
यही वो दिन होगा जब बहुत कुछ ठोस
टूट रहा होगा मन में
शुरू होगी बदलाव की यात्रा निज में
उस दिन दुनिया बदल जाएगी थोड़ी सी
जगत कुछ और नहीं
बाहर दिखने वाला भीतर का प्रतिबिंब ही तो है
“जीवन का रेखा गणित” इस संग्रह की शीर्षक कविता , जो
जीवन को एक झूठे नकाब के पीछे जीने की आम आदमी की विवशता या दिखावे का
शौक, जहां हर किसी ने अपने इर्द गिर्द एक झूठ का वृत बना रखा है , जिसके भीतर हमने स्वयं को एक मुखोटे के पीछे छुपा रखा है जहां हम बहुत कुछ
झेल रहे है किंतु बाह्य जगत के लिए जो उस दायरे के बाहर है सब ठीक होने का दिखावा
करते है। यही सभी के जीवन का रेखागणित है जो यथार्थ है ।
वहीं आज भी कन्या ज़न्म को समाज में स्त्री के अपराध के समकक्ष
मान जिस तरह से उसे प्रताड़ित किया जाता है उस पर तीक्ष्ण कटाक्ष करती व कन्या को
समर्पित है कविता “डॉटर्स डे” कविता की पहली ही पंक्ति :
“जिसके जन्म पर नहीं पीटी गयी थी थालियाँ” बेहद कटोच जाती है।
व्यवस्था व समाज से नफरत व नारी उत्पीड़न का दर्द शब्दों में बता पाना निःसंदेह
दुरूह कार्य है किन्तु वंदना जी ने बहुत खूबसूरती से शब्द दिए हैं भावनाओं को। अत्यंत भावुकता पूर्ण कविता है ।
“मायके आई हुई बेटियों” में बेटी के पैदा होते
ही मां की चिंताओं का बखान तो है ही साथ ही वह बहुत कुछ वह लिख गयीं हैं जो हम सभी
देखते हुए कभी अनुभव नहीं कर पाते, जैसे की वे लिखती हैं कि :
मायके आई हुयी बेटियां नहीं मांगती
संपत्ति में अपना हिस्सा
न उस दूध भात का हिसाब
जो चुपके से अपनी थाली से निकालकर
रख दिया था भाई की थाली में
न दिखाती लेखा जोखा
भाई के नाम किये गए व्रतों का।
इसी कविता में आगे के भाव बेहद भावुक करते हैं
जहाँ शायद बेटी को यह एहसास हो जाता है कि
अब तो यह घर पराया हो चुका है और वह अपने भाई से बहुत कुछ नहीं बस यही तो चाहती है
की :
कविता में यह कथन देखिए:
आसमान में निहारते हुए
मायके आई हुई बेटियां
बस। इतना ही
सुनना चाहती हैं
भाई के मुंह से
जब मन आए चली आना
यह घर तुम्हारा अपना ही है
बेटियों के प्यार व माँ के मन को समझ पाना कठिन
है। मां बेटी का प्यार जहाँ बेटी के मायके आने की खबर ही मां को एक ख़ुशी देकर उसके
दिल में जीने की एक नयी उमंग जगा देता है, देखिए कविता की ये पंक्तियाँ
हुलस कर मिलती चार आंखों में
छिप जाता है एक झूठ
बदल गया है बहुत कुछ
आगे पुराने समय से विदाई के वख्त बाँधी जाने
वाली पल्लू में गठान को भी किस भाव में संजोया है जो द्रवित कर जाता है। घर से विदाई के समय गांठ में जो थोड़े
से चावल बांधे जाते थे, वह
मायके की निशानी होते थे। चावलों के रूप में प्यार लिए विदा करना व् उस प्यार को
संजो कर रखने का सन्देश देते चावल के दाने जहाँ पिता का प्यार व भाई का लाड़ बताते थे और मन से मन के बंधन को
निरुपित करती गाँठ , देखिए कुछ पंक्तियां
दो चावल के दाने
एक में पिता का प्यार
और दूसरे में भाई का लाड़
धोते पटकते
निकल जाते हैं, चावल
के दाने
परगोत्री घोषित करते हुए
पर बंधी रह जाती है
गांठ
मन के बंधन की तरह
यह गांठ
कभी नहीं खुलेगी।
मायके में आई हुई बेटियों का अंत भाग भी वर्तमान
तेज़ जिंदगी पर चोट करता है जिसमें बचपन की सारी यादें आधुनिकता की कंक्रीट
संस्कृति में समाप्त हो चुकी है
वे कहती हैं की
पर है
मेरी स्मृतियों में
इस होने
और कहीं होने की कसक
तोड़ देती है मुझे
टूट कर बिखर जाता है सब
फिर समेटती हूँ तिनका तिनका
"बस, एक कप चाय का प्याला" कविता में जीवन के सच को
कितनी सहजता से कह गयीं हैं कि :
बस, एक कप चाय
का प्याला
कह देता है
हमारे-तुम्हारे
रिश्तों का सारा सच
“बस दस प्रतिशत” और “नमक का गणित” दोनों ही
कवितायेँ नारी केंद्रित है। दस प्रतिशत
में जहाँ नारी से नित प्रति बढती अपेक्षाओं को तंज़ रूप में लिया है तो वहीं "नमक
का गणित' नारी जीवन की नित दिन की मुश्किल बयां करती है। घर,
परिवार, के बीच पति की फरमाइश और मन को घायल करते ताने, उस का सारा जीवन इसी सब
गणित को समझने व संभालने में ही खर्च हो
जाता है और तभी वह स्वयं को वस्तु मान लेती है, जिसे सिर्फ भोगा जाना है वह मात्र एक
चलती फिरती मशीन हो जाती है जिसके जीवन से प्रेम की व्यापकता कम होने लगती है या
शायद समाप्त ही हो जाती है।
कड़वे सच के नश्तरों को
अर्थात तीखी से तीखी बात को भी अति सौम्य भाव में
व्यक्त करने की अद्भुत कला की स्वामिनी है वंदना जी। हर कविता अपने आप में भिन्न विषय ,कुछ भिन्न विचार कुछ अलग भाव संजोये हुए है यहाँ उल्लेख करना अनिवार्य हो
जाता है की उनकी विषय वस्तु विशिष्ठ है व वरिष्ट कवियत्रि के लेखन के विराट अनुभव
एवं लेखनी पर उनके सशक्त नियंत्रण का परिचायक है। प्रस्तुत काव्य संग्रह में नारी
मन के विभिन्न भावों को, नारी मन को परत
दर परत खोल के सामने रख दिया है वंदना जी ने।
अधिकांश कविताओं के
माध्यम से उन्होंने ने मध्यम वर्गीय समाज
की नारी की ख्वहिशों, सपनों को खूबसूरती से प्रस्तुत किया है। तुकबंदी से कवित्त
को नहीं बंधा गया किन्तु सुन्दर वाक्य
विन्यास है जहाँ छोटे वाक्य सरल शब्दों में भावनाए प्रगट कर देते हैं एवं शब्दों
का चयन भी श्रेष्ट है।
पूर्व में मेरे द्वारा वंदना जी की कहानी संग्रह “वो फोन कॉल”
पर अपने विचार समीक्षा रूप में साझा किये थे फिर अब अवसर प्राप्त हुआ उनके कविता
संग्रह “जीवन का रेखागणित”
को समझने का तो उसे बेहद गहनता से पढ़ कर कविताओं के मर्म को समझने
का प्रयास किया है वंदना बाजपेयी जी के लेखन के मूल भाव में बहुत ज्याद फर्क महसूस
नहीं हुआ क्यूंकि जिस प्रकार उनकी कहानियां आम आदमी के जीवन से जुड़ कर उसमें छोटी
छोटी खुशियाँ ढूंढती थी वैसा ही भाव उनकी कविताओं में भी द्रष्टव्य है जहाँ
उन्होंने नारी मन की व्यथा , उसकी घुटन , उसके अंतर्द्वंद को पहचाना है व् शब्द
दिए हैं , जो सहज ही इस बात का परिचायक है
की वे आम आदमी के दर्द को, उसकी भावनाओं को ही शब्द रूप दे रहीं हैं व आम आदमी के बीच की साहित्यकार है जो उसके मन को
समझ सकती हैं। जीवन में कुछ बड़ा पाने के लिए हमें बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है किन्तु
वंदना जी की कवितायेँ हमें उस छोटे से सुख को भी संगृहीत कर लेने का मशविरा देती हैं साथ ही कवितायें आम आदमी को उसके
दायित्वों और कर्तव्यों की पालना करने का सन्देश देती प्रतीत होती हैं। संग्रह की
कविताएं घोर अंधकार में जुगनू की भांति रास्ता दिखलाती हैं व सकारात्मकता के साथ
जीवन जीने का सन्देश देती हैं।
वहीं परस्पर विरोधी शीर्षक लिए हुए किन्तु समान भावार्थ अर्थात प्रेम की महत्त्ता बतलाती हुई
कविताएं है “प्रेम व्यापक है” और “प्रेम गली अति सांकरी”
चंद पंक्तियां देखें कि-
प्रेम का आध्यात्मिक स्वरूप
कितना भी विराट हो
पर बहुधा पारलौकिक के तिलिस्म में भटकते
लौकिक प्रेम में
मिलन के बाद नहीं रहता
सहअस्तित्व
वहीं दाम्पत्य के सच्चे अर्थ की अनुभूति को दिखावे के प्रेम से
खूबसूरती से तौला है कहती हैं कि :
नही मुझे कभी नहीं चाहिए डाली से टूटा लाल गुलाब
क्योंकि
मेरा लाल गुलाब सुरक्षित है
तुम्हारे ह्रदय में जो ताजा होता रहता है हर
धड़कन के साथ।।
और एक क्रूर सच को बयां करती है कविता "दोषी"
पुस्तक की अमूमन हर कविता अपने आप में कुछ खास है एवं उस कविता पर अगर
कुछ न लिखा जाए तो लगता है मानो कुछ अपराध सा हो गया ।
इसी अपराध बोध से बचने के लिए अभी तक करीब करीब आधी पुस्तक की कविताएं पढ़ी
उन पर अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तुत कर रहा हूँ बकाया कविताओं पर भी शीघ्र ही लिखूंगा ,थोड़ा इत्मीनान
से पढ़ने के बाद। समीक्षा भाग 2 में
सविनय
अतुल्य


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