Sanskar by Sraboni Bose

 

“संस्कार”

 

श्राबोनी बोस

ट्रू साइन पब्लिशिंग हाउस

 


 नवोदित लेखिका, श्रबोनी बोस यूं तो अध्यापन के कर्तव्य निर्वहन के संग गद्य साहित्य के सृजन में निरंतर योगदान कर रहीं है, अपितु यह उनका प्रथम प्रकाशित कहानी संग्रह है जो न केवल समाज में संस्कारों के अधोपतन कि और इंगित करता है, वरन सुसंस्कृत सामाजिक स्वरुप का परिचय भी उनके पात्रों के माध्यम हमें प्राप्त होता है। प्रथम प्रयास होने के बावजूद विशिष्ट अलंकारिक शब्दों एवं क्लिष्ट शब्दों को अनावश्यक रूप से प्रविष्ट करा कर लेखन को सुन्दर एवं तथाकथित आकर्षक एवं प्रभावशाली बनाने के लोभ से स्वयं को बचा सकी हैं, फलस्वरुप भाषा शैली सामान्य है, तथा भाषायी सम्पन्नता दर्शाने का बेमानी प्रयास कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता।

 कहानियों हेतु, समाज के बीच से ही पात्र चुने हैं सामान्यतौर पर कथानक मध्यमवर्गीय पात्रों पर केन्द्रित है एवं उनके परिवेश कि भाषा ही पात्रों की भाषा है, सहज एवं सरल भाषा, विषयवस्तु को सहज बोधगम्य बनती है। “यथा नाम तथा गुण” के कथन को चरितार्थ करते हुए मूलतः बात संस्कारों की ही करी गयी है।

 कहानी” बिंदु” नारी प्रधान एवं नारी केन्द्रित कथानक है जिसके ज़रिये लेखिका ने एक कतई अनछुए एवं बेहद संवेदनशील विषय “सेरोगेसी” अर्थात किराये की कोख से माँ बनने के विषय को उठाते हुए सेरोगेट मदर के दिल को सभी के सम्मुख खोल दिया है, इस व्यवस्था के मानवीय पहलु को सम्मुख रखा है। वह नारी जो अपनी किन्हीं मजबूरियों से वशीभूत, चंद पैसों के लिए 9 माह तक अपनी कोख में एक काया का सृजन करती है एवं बच्चे के जन्म के पश्चात उस पर उसका कोई अधिकार नहीं रह जाता, उस से उसका रक्त का रिश्ता तो बनता ही है किन्तु साथ ही एक और रिश्ता भी पनपता है, आत्मा का रिश्ता जो कि किसी को भी नज़र नहीं आता किन्तु उसे संवेदनशील लेखिका के दिल ने समझा, सोचा एवं शब्द दिए। बेहद भावुक कथानक एवं अंत में अपनी संतान (?) से बिछुड़ने का दृश्य अत्यंत मार्मिक है। सेरोगेट मदर अर्थात वह महिला जिसने अपनी कोख से एक बच्चे को जन्म दिया जिसकी माँ वह होते हुए भी नहीं है। क्या वह भावना शून्य हो 9 माह तक रह सकी होगी, या क्या उसके मन में, उसकी कोख में पलते हुए बच्चे के लिए कोई प्यार न उत्पान्न हुआ होगा। किसी और के बच्चे को जन्म देने हेतु जो शारीरिक कष्ट वह उठती है उसकी प्रतिपूर्ति तो चंद सिक्कों से कर दी जाती है, किन्तु उसके मानसिक कष्ट एवं उस लगाव का क्या जो किसी को नज़र ही नहीं आता, वह उस बच्चे को जन्म द्देती है जिसके लिए वह जानती है की वह तो मां भी नहीं कहलाएगी किन्तु क्या ताजीवन वह उस दर्द को और उस एहसास को भुला सकेगी जो उसने गर्भ धारित करते हुए 9 माह तक सहा । अत्यंत सरल भाषा में लेखिका नें सुन्दरता से उस नारी के दर्द, उसके एहसास और उसकी पीढ़ा को लिपिबद्ध किया है आसान वाक्यों में अपनी बात रखी है। कहीं भी व्यर्थ की उपदेशात्मक भाषा का प्रयोग नहीं है सो पाठक को उस से जुड़ने में कोई असहजता नहीं महसूस होती।

 वहीं एक और कहानी “आशियाना” में लेखिका नें घर से बाहर नारी स्वातंत्र्य एवं नारी को पुरुष समान अधिकारों की बड़ी बड़ी बात करने वाले तथाकथित समाजसुधारक एवं प्रगतिशील वर्तमान पुरुष प्रधान समाज के वास्तविक दृष्टिकोण का या कहें कि असली चेहरे का परिचय ,एक ऐसे दम्पत्ति को कथानक का मुख्य पात्र बनाते हुए करवाया है जो संपन्न हैं बड़े कारोबारी है किन्तु समस्या है पति के अलावा पत्नी का भी स्वयं का व्यवसाय। वह सफल भी है एवं दिनोदिन तरक्की के पथ पर अग्रसर भी है। आज सामन्य तौर पर नारी को हर तरह से प्रताड़ित कर घर सँभालने की सलाह देने वालों की कमी नहीं है यदि सीधे से न माने तो मां की ज़िम्मेवारियों में उलझा देना एक सफल हथकंडा है। “आशियाना” का कथानक भी इन सभी मोड़ों से गुज़रता है किन्तु जब नायिका समझौता नहीं करती तो परिणाम स्वरुप उसे अपना बना बनाया आशियाना छोड़ने के हालात निर्मित हो जाते हैं। अंततः क्या हल हुआ जानने के लिए अवश्य पढियेगा “आशियाना”।

 एक अन्य कहानी “बंदिनी” भी नारी प्रधान कथानक ले कर लिखी गयी है इसमें लेखिका ने महाविद्यालयों में, सद्ध्य युवाओं की उन्मुक्तता की चाहत, बेपरवाही भरे व्यवहार, एवं संस्कारों की धज्जियाँ उड़ाते असंस्कृत एवं अमर्यादित आचरण को ही जीवन का असली सुख मानती सोच को गंभीरता से उठाया है, तथा संस्कारित आचरण को रूढ़िवादिता एवं पिछड़ा मान बन्धनों में जकड़े होने का तंज़ देते हुए बंदिनी नाम दे नीचा दिखलाने के युवाओं के स्वभाव का वास्तविकता के बेहद करीब प्रतीत होता सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है, एवं नि:संदेह इस कथा के माध्यम से लेखिका अपनी बात को पाठकों तक पहचानें में पूर्णतः कामयाब हुयी है।

 वहीं “गहना प्यार का” तोहफे को पैसे से तौलने वालों के लिए, प्यार का भौतिकता के सापेक्ष मूल्यांकन करने वालों के लिए तगड़ी चेतावनी देता हुआ कथानक है। दाम्पत्य संबंधों पर आधरित किन्तु पति के प्यार का उसके प्यार से दिए गए तोहफों का पत्नी द्वारा रुपयों के आधार पर मूल्यांकन, एवं उपेक्षित व्यवहार जो स्वाभिमानी पति के आत्मसम्मान को आहत करता है एवं पत्नी अपने अपरिपक्व आचरण के चलते पती की नज़रों में अपना सम्मान खोकर मात्र पैसे को पूजने वाली स्त्री की छवि बना लेती है तथा बात घर के बिखरने तक आ जाती है। आगे क्या हुआ होगा जानने के लिए पढ़ें।

 एक अन्य कहानी “मायका“ नारी के, ससुराल के रोजाना के जीवन के त्रास को, बखान करती है। यह तो नहीं कहा जा सकता की हर घर ऐसा ही है किन्तु समाज में आज भी अधिकतर घरों में बहू बहू ही है उसे ताने सुनाना, भिन्न भिन्न तरीकों से प्रताड़ित करना, बहुत ही सामान्य सी बात है एवं ता जीवन शब्दों के तीखे नश्तर झेलना तो जैसे उसकी नियति है । इन सब के साथ भी समझौते कर उसे घर की इज्ज़त एवं मान मर्यादा बचाए रखने हेतु सबके सामने मुस्कुराना भी है किन्तु उसमें भी समस्या है की अगर बहू मुस्कुराये तो उसे बेहया का तमगा दे दिया जाता है और प्रतिकार करे तो संस्कारहीन। फिर भी नारी सिर्फ पति के प्रेम के सहारे हर गम सारे दुःख बर्दाश्त कर जाती है वैसे भी मजबूर औरत सब कुछ सहन करने हेतु बाध्य तो होती ही है। अत्यंत भावनात्मक एवं कटुसत्य बयां करती कहानी जिसमें कुछ सुन्दर शब्दों को पिरो दिया है जो की क्लिष्ट कदापि नहीं है, तथा चंद उक्तियाँ उल्लिखित करते हुए भी वे असहज नहीं हैं तथा कहानी पर पकड़ बनाये रखते हुए सामान्य प्रवाह बना रहता है।

 इस कहानी संग्रह की पहली एवं कह सकते है मुख्य कहानी है “सफ़र परी का”। नारी प्रधान कथानक है। मुख्यतः आपसी समझ, प्रेम एवं पारिवारिक सदस्यों के बीच सहृदयता से कैसे एक परिवार खुशहाल रहता है, तथा कैसे दाम्पत्य जीवन निर्बाध, प्रेम पूर्वक, बगैर किसी उथल पुथल के अपने जीवन रुपी सफ़र की पूर्णता की ओर बढ़ता रहता है सामान रूप से इन विषयों पर केन्द्रित करते हुए नारी के जन्म से लेकर अवसान तक के सफ़र के हर उतार चढाव की, हर उस छोटी बड़ी समस्या की जिस से वह दो चार होती है हर वह चुनौती जिसका वह सामना करती है एवं अंततः विजय प्राप्त करती है का बहुत ही सूक्ष्म अवलोकन, अनुसन्धान एवं विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती कहानी है । विजय वह विनय से स्वीकार कर रही है वहीं चुनौती का डटकर मुकाबला करते हुए स्वयं का एवं परिवार का भी मान सम्मान बनाये रखती है। कथानक का हर मोड़ पर एक सन्देश एवं एक प्रेरणा है।

 कहानी “विवाह का त्याग”समाज में व्याप्त बाल विवाह कि कुप्रथा पर प्रश्न चिन्ह उठाती है वहीं नारी के त्याग और समर्पण कि सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति है। पात्रों के भाव शब्दों के द्वारा दिल तक उतरने में सक्षम हुए है फलस्वरूप पात्र पाठकों कि संवेदना या तिरस्कार पाते हैं। बालपन में व्याही गयी कन्या को जब युवक ठुकरा कर अन्यत्र विवाह कर लेता है तब रोचक परिस्थितियों में उनका पुनः मिलना तथा युवती द्वारा अपने प्रेम को, अपने बचपन में व्याहे पति को पुनः पा लेना तो रोचक है ही अंत और भी रोचक है।

 “रिया कि दास्ताँ” भी भिन्न विषयवस्तु के साथ किन्तु हमारे बीच से ही लिया गया कथानक हैं जिनका अत्यन ख़ूबसूरती से वर्णन किया गया है। वहीं “दहेज़ एक पीड़ा” में इस विकराल समस्या के विषय को उठाया गया है।

 संस्कारों को केंद्र में रख कर मुख्यतः मध्यमवर्गीय समाज के पात्रों के संग

रचित सभी कथानक रोचक हैं एवं सरसता बनाये रखते हुए अपनी बात बहुत ही शालीनता से पाठकों तक पहुचने में सक्षम है। बेशक यह लेखिका का प्रथम प्रकाशित संग्रह है किन्तु अपने प्रथम प्रयास में उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय बखूबी दिया है। भविष्य में उनकी उत्तरोत्तर प्रगति एवं साहित्य में श्रेष्ठ योगदान हेतु शुभकामनाएं ।

 

सादर

अतुल्य

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